*खेती-किसानी* माकुल कुला होके,, खेत खार के बुता करत हे।। मुड़ के बीड़ा ल कांदी के,, गरवा-बछरु ह,मतंग चरत हे।। नोनी लईका ह दाई-ददा संग,, खलिहान म धान छिचत हे।। चिखला-माटी ल गोड़ म खुंद के, बीझां ल उपजाए बर सींचत हे।। नांगर बैला ल फांद के,, बन-कचरा ल फेकत हे।। तता-तता,,कहत-कहत,, सांप-ड़ेढ़हु ल घलोक देखत हे।। बिहनिया ल माई-पिला मन,, किसानी बर,खेत-डहर जावत हे। संगे-संग,रोटी-पीठा ल खात, संझा-मंझनिया ल पहावत हे।। किसान के इहि जिनगानी, खेत म कले-चुप,आवत-जात हे।। भुइयाँ के किसान ह देवता हरै,, जुग-जुग ल सुनत कहावत हे।। शब्द -रचना राकेश-देवांगन-भटगाँव kisaan ki beti